आज नहीं तो कल कोरोना की भयावहता कम हो जाएगी, लेकिन अपने पीछे बहुत से सवाल छोड़ जाएगी, सवाल कि लॉकडाउन में फंसे मासूमों की परवाह किसी ने क्यों नहीं की, थोपे गए पलायन के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा?अंतहीन सफर में हजारों कदम मंजिल तक पहुंचने से पहले ही क्यों थम गए, क्यों समय से पहले ही बोझ तले दबे मासूम समझदार हो गए। दम तोड़ती माताओं के बच्चों को ममता की छांव क्यों नसीब नहीं हुई, क्यों गरीबी में जीते मजदूरों की किसी ने परवाह नहीं की। जिम्मेदारों ने क्यों इसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं समझा, क्यों लगातार चलने और थकने पर भी रुकने की इच्छा नहीं हुई। बेबसी के आगे क्यों हौसले पस्त पड़ गए, क्यों किसी की इन पर करुणा दृष्टि नहीं पड़ी। जरूरत पर क्यों इन्हें अकेला छोड़ दिया, क्यों अचानक दुनिया में अस्थिरता फैल गई। पलायन का दर्द क्यों झेलना पड़ा, क्यों मुश्किल के दौर में रिश्तों में भी अपनापन नहीं रहा और आखिर क्यों गरीबों पर ये मुसीबत कहर बन कर टूट पड़ी। सिस्टम से सवाल करती ऐसी ही 15 तस्वीरें...
बड़ी मुश्किल है घर की डगर

यूपी के बलरामपुर निवासी बलरामसिंह यादव आठ साथियों के साथ 16-17 मार्च को माउंट आबू घूमने आएथे,लेकिन लॉकडाउन में फंस गए। लगातार पैदल चलने से उसकेपैरों में छाले पड़ गए तो अपनी शर्ट को फाड़कर पट्टी बांध ली। अन्य प्रवासी मजदूरों का भी हाल यही है। कई मजदूर जुगाड़ की गाड़ी से ही घर के सफर पर निकल पड़े हैं।
सिजेरियन के 15 दिन बाद ही गांव जाने की मजबूरी

सिजेरियन डिलीवरी के बाद जहां 10 दिन तक हॉस्पिटल भी मां को डिस्चार्ज नहीं करता, वहीं हालात ने सवा महीना पूरा होने से पहले ही एक मां को 15 दिन के बच्चे की परवरिश के लिए शहर छोड़कर गांव जाने पर मजबूर कर दिया। मां की अपनी हालत ऐसी है कि जमीन पर बैठा भी नहीं जा सकता, लेकिन औलाद की खातिर मां सब कुछ सहन करने को तैयार हो गई। 15 दिन की आयशा को गोद में लेकर जब जमीन पर बैठना मुश्किल हुआ तो पुलिस ने अपनी इंसानियत दिखाते हुए महिला को कुर्सी पर बिठाया, पानी पिलाया औ खाने के लिए भी पूछा।
रोजगार पर लगे ताले, खाने के पड़े लाले, पैरों में छाले....

प्रवासी मजदूर हालात के मारे व किस्मत से बेचारे बन रह गए हैं। इसी बेबसी को सैकड़ों प्रवासियों ने साइकिल से जोड़ दिया है। टूटी फूटी साइकिल पर घरेलू सामान व अपनों को समेटकर ये पैदल सैकड़ों किमी का सफर पैदल नापने रोजाना निकल रहे हैं। इन्हें बस चलते जाना है। साइकिल पर सवार मासूम बच्चा सोते हुए। इस धूप में नींद के लिए उसे छांव और पंखे की जरूरत ही नहीं पड़ी।
फर्ज: यह पिता है, कोई सरकार नहीं...

न तो मजदूरों की घर वापसी थम रही है न उनसे जुड़ी दर्द और दुख की कहानियां। ऐसी ही एक तस्वीर आंध्र प्रदेश के कुर्नूल से अपने घर छत्तीसगढ़ तक के 1200 किमी के सफर पर निकले पिता की सामने आई है। लॉकडाउन में काम से नाता टूटा तो घर लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। सफर लंबा और बेहद कठिन है। साथ में दो बेटियां भी हैं। उनके नन्हें कदम इस दूरी को भला कैसे नाप पाएंगे। सरकार भले ही भूल जाए पर पिता कैसे अपना फर्ज भूल सकता है। पिता ने बेटियों के लिए इस तरह की कांवड़ बना दी। अब दोनों बेटियां पिता की छांव में घर तक का सफर तय कर रही हैं।
18 दिन में ही देख ली दुनिया

इस बच्ची का जन्म लॉकडाउन के बीच 18 दिन पहले हुआ है। लेकिन इस छोटे से समय में उसने जान लिया कि जीवन कितना कठिन है। बच्ची के पिता मजदूरी करते थे। काम बंद होने से घर में खाने का संकट आ गया। शनिवार दोपहर मां नीतू देवी 40 डिग्री तापमान के बीच बच्ची को गोद में ले जींद की विश्वकर्मा कॉलोनी से 7 किमी. पैदल चलकर राजकीय पीजी कॉलेज पहुंची, तब जाकर उन्हें खाना नसीब हुआ। यूपी के आजमगढ़ के रहने वाले इस परिवार के पास अब घर भेजे जाने का मैसेज भी आ गया है,लेकिन बस के लिए 24 घंटे का और इंतजार करना होगा।
मां! घर कब पहुंचेंगे...

यह तस्वीर भोपाल बायपास की है। महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश जा रहे मजदूरों का मिनी ट्रक यहां रुका तो तेज धूप में मां की गोद में बैठी चार साल की बच्ची यही पूछती रही- मां! घर कब पहुंचेंगे।
घर वापसी के बेरहम सफर पर मासूम बचपन

ये तस्वीरें भोपाल और आसपास के बाहरी इलाकों की हैं। ये बचपन भी अपने मजदूर-मजबूर माता-पिता के साथ सफर में है। इनकी मासूम आंखें हर वक्त यही पूछती हैं कि क्या घर लौटना इतना मुश्किल होता है?
नींद नहीं मानती

यह परिवार गृहस्थी का जरूरी सामान अपनी बाइक पर लादकर गुजरात से अपने घर बिहार लौट रहा है। करीब पांच साल का बच्चा बाइक के लगभग टैंक पर बैठा है। सफर लंबा है... नींद आई तो आगे रखे बैग पर सिर टिकाकर सो गया।
ऐसी बेबसी...मां-बेटी के पास एक ही जोड़ी चप्पल

अजमेर से मध्य प्रदेश के पन्ना के लिए निकली इन मां-बेटी के पास हौसला और उम्मीद के सिवाय कुछ नहीं है। 750 किमी के लंबे सफर में मां-बेटी के पास एक ही जोड़ी चप्पल है, जिसे वे बदल-बदल कर पहनते हैं। चप्पल टूटने के डर से वे कई किमी चप्पल हाथ में लेकर चत रहे हैं।
इस मासूम के पास बस मां थी...

छतरपुर में कपड़ा लगे ट्रक के पलटने से 6 लोगों की मौत हो गई। इसी में सवार यूपी की गुड़िया ने भी मौके पर दम तोड़ दिया। 5 साल की बेटी आलिया गंभीर घायल है। 2 साल का बेटा शव के पास बैठा बिलखता रहा। उसके पिता की भी 6 महीने पहले मौत हो चुकी है।
नेता जी, आपके परिवार का कोई बच्चा बिना दूध और खाने के तड़पता, तब आप क्या करते

घर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने जीरकपुर(पंजाब) पहुंचे प्रवासियों को खाने के लाले भी पड़े हैं। पैसा न होने से वे खाने का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं। शनिवार को सिंगपुरा बस अड्डे पर किसी संस्था के कुछ लोग बिस्कुट बांटने पहुंचे तो एक-एक बिस्कुट के लिए दर्जनों हाथ उठे, वहीं कुछ छोटे बच्चे तेज धूप में नंगे पांव घूमते दिखे।
बेबसी की भागमभाग

बठिंडा में एम्स का प्रोजेक्ट रुक गया है। यहां पश्चिम बंगाल के मजदूर बिहार व झारखंड के लोगों के घर जाने के बाद ट्रेन की मांग कर रहे हैं। घर जाने की मांग पर अड़े हंगामा कर रहे मजदूरों को पुलिस समझने गई तो पुलिस पर पथराव कर दिया। पुलिस ने सख्ती की तो प्रदर्शन कर रहे मजदूर भागते हुए नजर आए। फोटो : अश्विनी काका
यमुनानगर के गांवके सरकारी स्कूल में रोके गए प्रवासी

हरियाणा के यमुनानगर में प्रवासी मजदूर शनिवार को सड़क पर उतर आए। उन्होंने नए बने बाइपास हाईवे पर जाम लगा दिया। इस दौरान गांव के लोगों ने उन्हें समझाया, लेकिन वे नहीं माने। कुछ ने वहां पर पथराव कर दिया। इसी दौरान सूचना पुलिस को दी गई। इस दौरान पुलिस ने हल्का लाठीचार्ज कर उन्हें खदेड़ा।
स्ट्रेचर पर जिदंगी...

ये हैं बिहार समस्तीपुर के पवन देवी और चंदन कुमार। चंदन की दोनों किडनी खराब हैं। वे डायलिसिस पर हैं। पीजीआई आए थे ट्रांसप्लांट करवाने। ऑपरेशन होना था कि लॉकडाउन हो गया। पांच साल के बेटे के साथ पीजीआई की रोटरी सराय में आश्रय लिया। हफ्ते में दो डायलिसिस होतेहैं। एक दिन चंदन फिसलकर गिरे तो उनका पैर भी टूट गया। लॉकडाउन की वजह से ऑटो-रिक्शा सब बंद है। चंदन अब चल फिर नहीं सकते इसलिए पवन देवी ने सराय से स्ट्रैचर लिया और पति का डायलिसिस करवाने नयागांव के लिए चल पड़ी।
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From Dainik Bhaskar
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